मनुष्य के जीवन में शब्दों का स्थान केवल संचार का माध्यम नहीं है। शब्द वास्तव में मनुष्य की चेतना का प्रत्यक्ष रूप हैं। जो भीतर चलता है वही बाहर बोल बनकर प्रकट होता है। इसलिए भारतीय परंपरा में एक सरल किंतु गहरी शिक्षा दी गई है “शुभ-शुभ बोलो।”
पहली दृष्टि में यह वाक्य एक साधारण सामाजिक सलाह जैसा प्रतीत होता है। कई लोग इसे अंधविश्वास भी समझ लेते हैं। परंतु यदि इसे ध्यान से समझा जाए तो यह केवल शब्दों की मर्यादा नहीं बल्कि मानव चेतना, प्रकृति और जीवन के संतुलन से जुड़ा हुआ सिद्धांत है।
भारतीय दर्शन में मन, वाणी और कर्म को मनुष्य के जीवन के तीन मूल आयाम माना गया है। मन में जो विचार उठते हैं, वही वाणी के माध्यम से शब्द बनते हैं और फिर कर्म के रूप में संसार में प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इसीलिए प्राचीन ऋषियों ने वाणी को केवल बोलने की क्रिया नहीं बल्कि एक शक्ति माना है। वेदों में “वाक्” को देवी के रूप में वर्णित किया गया है, क्योंकि शब्दों के माध्यम से ही विचार समाज में फैलते हैं और सामूहिक चेतना का निर्माण करते हैं।
सांख्य दर्शन हमें यह समझाता है कि प्रकृति तीन गुणों से बनी है— सत्त्व, रज और तम। यही तीन गुण मनुष्य के मन और व्यवहार में भी प्रकट होते हैं। जब मनुष्य सत्त्वगुण में स्थित होता है तो उसकी भाषा में शांति, संतुलन और शुभता दिखाई देती है। जब रजोगुण बढ़ता है तो भाषा में उतावलापन और प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है। और जब तमोगुण का प्रभाव होता है तो वाणी कठोर, नकारात्मक और निराशाजनक हो जाती है।
इस दृष्टि से “शुभ-शुभ बोलो” का अर्थ केवल अच्छे शब्द बोलना नहीं है। इसका अर्थ है कि मनुष्य अपने भीतर ऐसी चेतना विकसित करे जहाँ से निकलने वाले शब्द स्वाभाविक रूप से संतुलित और कल्याणकारी हों।
योग की परंपरा भी इसी सत्य की ओर संकेत करती है। योग का उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ बनाना नहीं बल्कि मन और चेतना को संतुलित करना है। जब मनुष्य का मन शांत और संतुलित होता है, तो उसकी वाणी भी संयमित हो जाती है। सहज योग और ध्यान की परंपराओं में यह देखा गया है कि जब व्यक्ति भीतर से शांत होता है तो उसके शब्द भी स्वाभाविक रूप से सकारात्मक और संतुलित हो जाते हैं। यही कारण है कि योगिक साधनाओं में मंत्र, प्रार्थना और सकारात्मक वाक्यों का उपयोग किया जाता है।
आधुनिक विज्ञान भी अब इस बात को समझने लगा है कि शब्दों और विचारों का मानव मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मनोविज्ञान में यह सिद्ध किया गया है कि मनुष्य के विचार और उसकी भाषा उसके मानसिक ढाँचे को प्रभावित करते हैं। यदि कोई व्यक्ति बार-बार नकारात्मक भाषा का उपयोग करता है : जैसे “सब खराब है”, “कुछ अच्छा नहीं होगा” – तो उसका मस्तिष्क उसी नकारात्मक दृष्टिकोण को मजबूत करने लगता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति सकारात्मक और संतुलित भाषा का उपयोग करता है तो उसके भीतर आशा और प्रेरणा की भावना विकसित होती है।
यदि हम प्रकृति की ओर देखें तो वहाँ भी एक गहरा सामंजस्य दिखाई देता है। पृथ्वी स्वयं एक निरंतर कंपन करने वाली प्रणाली है। समुद्र की लहरों की ध्वनि, हवा की गति, पर्वतों की गूँज—ये सब प्रकृति के कंपन हैं। मनुष्य की वाणी भी इसी कंपन का हिस्सा है। जब मनुष्य क्रोध और घृणा से भरे शब्द बोलता है, तो वह उसी प्रकार की ऊर्जा वातावरण में जोड़ता है। इसके विपरीत जब वह शांत और शुभ शब्द बोलता है, तो वातावरण में सामंजस्य और संतुलन की ऊर्जा बढ़ती है।
दर्शनशास्त्र हमें यह भी बताता है कि मनुष्य केवल अपने लिए नहीं जीता। वह समाज का हिस्सा है। उसकी भाषा और व्यवहार समाज की मानसिकता को भी प्रभावित करते हैं। यदि समाज में लोग निरंतर नकारात्मक भाषा बोलते रहें, आलोचना, अपमान और निराशा तो धीरे-धीरे समाज की चेतना भी उसी दिशा में ढलने लगती है। इसके विपरीत यदि समाज में प्रोत्साहन, सद्भाव और आशा की भाषा प्रचलित हो, तो लोगों के भीतर सहयोग और विश्वास का वातावरण बनता है।
इतिहास में महान व्यक्तियों की वाणी को यदि देखा जाए तो उसमें हमेशा आशा और उद्देश्य का भाव दिखाई देता है। उन्होंने शब्दों के माध्यम से लोगों के भीतर आत्मविश्वास और दिशा जगाई। उनके शब्द केवल वाक्य नहीं थे, बल्कि चेतना को जगाने वाली ऊर्जा थे।
इसलिए “शुभ-शुभ बोलो” का वास्तविक अर्थ यह है कि मनुष्य अपने विचारों और शब्दों के प्रति सजग हो। हर शब्द केवल बोलकर समाप्त नहीं हो जाता; वह किसी न किसी रूप में मन और समाज को प्रभावित करता है।
जब मनुष्य शुभ बोलता है तो वह केवल दूसरों को नहीं बल्कि स्वयं को भी संतुलित करता है। उसकी वाणी में करुणा और स्पष्टता आती है। उसके शब्द लोगों के भीतर आशा जगाते हैं। और धीरे-धीरे वही शब्द समाज की चेतना में सकारात्मकता का बीज बो देते हैं।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि वाणी केवल ध्वनि नहीं है। वह मनुष्य के भीतर की चेतना का प्रतिबिंब है। यदि मनुष्य की चेतना शुभ है, तो उसके शब्द भी शुभ होंगे। और जब शब्द शुभ होते हैं, तब जीवन में भी संतुलन, शांति और प्रकाश का मार्ग खुलने लगता है।
इसीलिए हमारे पूर्वजों ने एक सरल लेकिन गहरी शिक्षा दी – “शुभ-शुभ बोलो।”
क्योंकि कभी-कभी एक शुभ शब्द किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकता है।
और कई बार वही शब्द पूरे समाज की चेतना को भी एक नई दिशा दे देते हैं।
( नीचे संत और साधक के संवाद को कम पंक्तियों मे भी लिखा जा सकता था परन्तु इति पंक्तियों मे लिखने का एक विशेष कारण है कि जब एक लाइन आप पढ़ कर समाप्त करें तो उस लाइन के बारे मे आपण स्वयं का चिंतन भी करें । )
वृंदावन की एक शांत सुबह
वृंदावन की एक शांत सुबह थी। यमुना के किनारे हल्की धूप उतर रही थी। मंदिर के प्रांगण में बैठे संत के पास एक युवक आया। उसके चेहरे पर जिज्ञासा भी थी और भीतर कहीं एक उलझन भी।
उसने संत को प्रणाम किया और विनम्रता से बैठ गया। कुछ क्षण मौन रहा। फिर उसने धीरे से कहा ;
“महाराज जी, मन में कई प्रश्न उठते हैं। यदि आप अनुमति दें तो पूछूँ?”
संत मुस्कुराए,
“प्रश्न ही साधना का आरंभ है। पूछो।”
युवक ने पहला प्रश्न रखा।
प्रश्न 1 : मनुष्य के जीवन में शब्दों का क्या स्थान है?
संत ने कुछ क्षण आँखें बंद कीं और बोले—
“बेटा, शब्द मनुष्य के जीवन में वही स्थान रखते हैं जो बीज धरती में रखते हैं।
जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही वृक्ष उगता है।
मनुष्य के जीवन में विचार बीज हैं, शब्द अंकुर हैं और कर्म वृक्ष हैं।
जो मन में चलता है वही शब्द बनकर बाहर आता है, और वही शब्द धीरे-धीरे जीवन की दिशा बना देते हैं।
किसी मनुष्य की वाणी सुनकर तुम उसके भीतर का संसार पहचान सकते हो।
जिसकी वाणी में शांति है, उसके भीतर शांति है।
जिसकी वाणी में क्रोध है, उसके भीतर आग जल रही है। इसलिए शब्द केवल बोल नहीं हैं शब्द
“मनुष्य के भीतर की अवस्था का दर्पण हैं।”
युवक कुछ देर सोचता रहा, फिर उसने दूसरा प्रश्न किया…
प्रश्न 2 : क्या शब्द सच में ब्रह्म हैं?
संत मुस्कुराए।
“यह प्रश्न बहुत प्राचीन है। वेदों में कहा गया है : ‘ नाद ही ब्रह्म है। ’
जब यह सृष्टि बनी, तब सबसे पहले कंपन हुआ, उसी कंपन से ध्वनि बनी।
ध्वनि से ही शब्द बने।
इसलिए शब्द ब्रह्म की अभिव्यक्ति हैं।
देखो, एक छोटा सा शब्द किसी व्यक्ति के हृदय को तोड़ सकता है, और वही शब्द किसी टूटे हुए मनुष्य को जीवन दे सकता है।
यदि शब्द इतने प्रभावशाली हैं कि वे मनुष्य के जीवन को बदल सकते हैं, तो समझो कि उनमें कोई साधारण शक्ति नहीं है।
शब्द ब्रह्म इसलिए कहे गए हैं क्योंकि
वे चेतना की तरंग हैं।”
युवक की आँखों में आश्चर्य था।
प्रश्न 3 : मनुष्य को अपने शब्दों के प्रति सजग क्यों रहना चाहिए?
संत ने पास रखे जल के पात्र की ओर इशारा किया। “यदि इस जल में तुम ज़हर मिला दो, तो क्या होगा?”
युवक बोला-“वह पीने योग्य नहीं रहेगा।”
संत बोले – “ठीक वैसे ही शब्द भी हैं।कभी-कभी मनुष्य क्रोध में बोल देता है पर वह भूल जाता है कि शब्द हवा में खोते नहीं, वे किसी के मन में बस जाते हैं। एक कठोर शब्द वर्षों तक किसी के मन में पीड़ा बनकर रह सकता है और एक प्रेमपूर्ण शब्द वर्षों तक किसी को संभाल सकता है, इसलिए सजगता आवश्यक है। क्योंकि शब्द बाहर निकलने के बाद वापस नहीं आते।”
प्रश्न 4 : शब्द और शुभ का क्या संबंध है?
संत ने वृक्ष की ओर देखते हुए कहा : “जब शब्द हृदय की शुद्धता से निकलते हैं, तब वे शुभ होते हैं।शुभ शब्द वह हैं जो किसी के भीतर आशा जगाएँ, जो किसी के मन को हल्का करें, जो किसी को आगे बढ़ने की प्रेरणा दें। शुभ शब्दों में एक अद्भुत गुण होता है – वे वातावरण को भी बदल देते हैं।
घर में प्रेम और सद्भाव की भाषा बोली जाती है,वहाँ का वातावरण भी शांत रहता है।”
युवक अब और गहरे प्रश्न की ओर बढ़ा।
प्रश्न 5 : क्या शब्द चेतना हैं?
संत ने कहा,
“हाँ, शब्द चेतना की तरंग हैं। जैसे जल में पत्थर डालने से तरंगें बनती हैं, वैसे ही मन में उठे विचार शब्द बनकर तरंगें फैलाते हैं। जब तुम प्रेम से बोलते हो तो तुम्हारी चेतना की तरंगें सामने वाले तक पहुँचती हैं। इसीलिए कभी-कभी कोई व्यक्ति कुछ कहता भी नहीं, पर उसकी उपस्थिति ही शांति देती है क्योंकि उसकी चेतना शांत होती है।”
प्रश्न 6 : शब्दों का आभामंडल पर क्या प्रभाव पड़ता है?
संत ने हाथ से एक वृत्त बनाते हुए कहा :
“हर मनुष्य के चारों ओर एक ऊर्जा-क्षेत्र होता है, उसे आभामंडल कहते हैं। तुम्हारे विचार, तुम्हारी वाणी और तुम्हारे कर्म—
तीनों मिलकर उस आभामंडल को बनाते हैं। यदि मनुष्य क्रोध, ईर्ष्या और कटुता से भरा रहता है, तो उसका आभामंडल भारी और अशांत हो जाता है।और यदि मनुष्य प्रेम, कृतज्ञता और शुभ विचारों में रहता है, तो उसका आभामंडल उज्ज्वल और हल्का हो जाता है।”
प्रश्न 7 : आभामंडल जीवन को सहज या कठिन कैसे बनाता है?
संत ने कहा – “बेटा, आभामंडल एक चुंबक की तरह काम करता है। जैसी तुम्हारी ऊर्जा होती है, वैसी ही परिस्थितियाँ तुम्हारी ओर आकर्षित होती हैं। यदि मनुष्य भीतर से शांत और सकारात्मक है, तो लोग उसके पास आकर सहज महसूस करते हैं और यदि कोई भीतर से अशांत है, तो उसके आसपास भी तनाव का वातावरण बन जाता है।”
प्रश्न 8 : आभामंडल कैसे बनता है ?
संत बोले –
“आभामंडल एक दिन में नहीं बनता। यह तीन चीजों से बनता है :
- तुम्हारे विचार
- तुम्हारे शब्द
- तुम्हारे कर्म
इन तीनों का लगातार प्रभाव तुम्हारे चारों ओर एक ऊर्जा-क्षेत्र बना देता है।”
प्रश्न 9 : क्या आभामंडल बदला जा सकता है?
युवक ने उत्सुकता से पूछा।
संत मुस्कुराए, “हाँ, अवश्य। जैसे एक कमरा साफ किया जा सकता है, वैसे ही आभामंडल भी शुद्ध किया जा सकता है।
इसके तीन सरल उपाय हैं :
. अपने विचारों को सकारात्मक बनाओ
. अपनी वाणी को मधुर बनाओ
. अपने कर्मों को सच्चा बनाओ
धीरे-धीरे तुम्हारा आभामंडल बदलने लगेगा।”
युवक कुछ देर मौन रहा। फिर उसने सिर झुका लिया।“महाराज जी, अब समझ आया, मनुष्य का जीवन केवल कर्म से नहीं, उसकी वाणी और चेतना से भी बनता है।” संत ने स्नेह से कहा – “बेटा, याद रखो – विचार बीज हैं, शब्द फूल हैं और कर्म फल हैं। यदि बीज शुभ होंगे, तो फूल भी सुगंधित होंगे और फल भी मधुर होंगे।” यमुना के किनारे हवा धीरे-धीरे बह रही थी। युवक उठकर प्रणाम करता है। उसके चेहरे पर अब प्रश्न नहीं थे, केवल एक गहरी शांति थी।


